ग्रसनी , ग्रासनली का कार्य

•ग्रसनी में पाचन की प्रक्रिया नहीं होती है। 
 
•ग्रसनी में केवल क्रमाकुंचन गतियाँ होती है जिसके कारण भोजन ग्रसिका में प्रवेश करता है। 
 
•ग्रसनी में श्वासनली जुडी रहती है। 
 
•श्वासनली पर एक ढक्कन पाया जाता है जिस एपिग्लोटिस  ढक्कन कहा जाता है। 
 
•एपिग्लोटिस भोजन को श्वासनली में जाने से रोकताहै।
 
•जब गलती से भोजन का टुकड़ा श्वासनली में चला  जाता है। तब डायफ्राम में लगातार संकुचन तथा  शिथिलन होता है। जिसके कारण एक ध्वनि का  निर्माण होता है। जिसे हिचकी कहा जाता है। 
 
•ग्रसनी भोजन तथा वायु का उभयनिष्ठ मार्ग है। 
 
•यह 12 सेमी. लम्बी, तालु के पीछे स्थित नली होती है।ग्रसनी में मुखगुहा व नासा मार्ग मिलते हैं।यह वायु व भोजन का सहमार्ग होती है।इसके अतिरिक्त यह बोलने में गूंज उत्पन्न करती हैं।  
 
•भोजन निगलते समय श्वास नाल एपिग्लोटिस से ढक  जाता है, जो इसमें भोजन जाने से रोकती है। 

कार्य:- यह भोजन को ग्रासनली तक पहुँचाती है। 
  

ग्रासनली (Oesophagus) :-
•यह पतली, पेशीय, संकुचनशील लम्बी नली है।   ग्रसनी, निगलद्वार द्वारा आहारनाल के दुसरे भाग   ग्रासनली में खुलती है इसकी दीवार में पाचन ग्रंथियाँ   नहीं होती है। परन्तु श्लेष्मा ग्रंथियाँ होती है, जिससे   भोजन फिसलता हुआ आमाशय में पहुँच जाता है। 

•आमाशय में पाचन की प्रक्रिया नहीं होती है। 

कार्य:- यह भोजन को आमाशय तक पहुँचाती है। 

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