श्वेत रक्त कणिकाएँ /WBC किसे कहते है? जीवनकाल | पुरा नाम | आकार | रंग | कार्य | संख्या | निर्माण | प्रकार

WBC का जीवनकाल:-
-WBC का जीवनकाल 2-4 दिन का होता है। 
-श्वेत रक्त कणिका का जीवनकाल कुछ घण्टों से कुछ दिन तक ( कणिकामय) या कुछ मास तक ( अकणिकामय) 

WBC का पुरा नाम:-
WBC का पुरा नाम = White Blood Corpuscles ( श्वेत रक्त कणिका) 
 
WBC का आकार:-
-WBC( श्वेत रक्त कणिका) आकार और रचना में अमीबा के समान होता है, गोल या अनियमित
-WBC का व्यास 12-20um होता है। 

WBC का रंग:-
WBC रंगहीन ( हीमोग्लोबिन की अनुपस्थिति के कारण) होता है। 

 WBC का कार्य:-
-WBC हानिकारक सूक्ष्म जीवों का भक्षण करती है 
इसलिए इसे शरीर का सैनिक कहा जाता है।

WBC की संख्या:-
-WBC की सख्या 8000-10,000/ घन होती है। 
-WBC की सख्या बढने पर एलर्जी अथवा Blood Canncar(ल्यूकेमिया) के संकेत है।

-रक्त की एक लीटर मात्रा में 4×109 से लेकर 1.1×1010 के बीच श्वेत रक्त कोशिकायें होती हैं, जो किसी स्वस्थ वयस्क में रक्त का लगभग 1% होता है।

-WBC की कमी को ल्युकोपिनीयि कहते है।  
-WBC की अधिकता को ल्युकोसाइटोसिस कहते है।

WBC का निर्माण:-
-WBC का निर्माण थाइमस,अस्थिमज्जा में होता है। 
-इसकी मृत्यु रक्त में ही हो जाती है। 

•WBC में केन्द्रक पाया जाता है।
•इसमें कोशिश विभाजन नहीं होता है।
•WBC को Leucocytes(ल्यूकोसाइट्स)भी कहते है। 
•WBC का अधिक भाग (60-70%) न्यर्टोफिल्स कणिकाओं का बना होता है। 

WBC के प्रकार:-
(A) कणिकामय                      (B) अकणिकामय 
 1. न्युट्राफिल                            1. लिफोसाइट         
 2. बेसोफिल                             a. T- लिफोसाइट
 3. इओसोनोफिल                      •   T- Helper
                                                •   T- Killer
                                                b. B- लिफोसाइट
                                                2. मोनोसाइट
(A) कणिकामय-
  1. न्युट्राफिल - शरीर में सर्वाधिक मात्रा में पाई जाने    वाली WBC(65%) 
-ये हानिकारक सूक्ष्म जीवों का भक्षण का कार्य करती है। -इसलिए इसे बृहदभक्षाणु कहा जाता है। 
-इसका केन्द्रक बहुपालित होता है। 

 2. बेसोफिल - 
-शरीर में सबसे कम मात्रा में पाई जाने वाली WBC(0.1-1%)
-ये हिस्टामिन तथा हिपेरिन का स्त्राव करती है। 
-हिस्टामिन एलर्जी में प्रयुक्त होता है। 
 
-एलर्जी में रुधिर में बेसोफिल कणिकाओं की संख्या  बढती है। 
 
-हिपेरिन रक्तवाहिनियों में रुधिर को जमने से रोकता है। अतः इसे प्रतिस्कंदक कारक कहा जाता है। 
-इसका केन्द्रक त्रिपालित होता है। 

3. इओसोनोफिल/ एसिडोफिल्स/ऑक्सिफिल्स:-
-शरीर में इसकी मात्रा 1-2% पाई जाती है। 
-ये संक्रमण से लड़ने का कार्य करती है। 
-संक्रमण के समय इओसोनोफिल की संख्या बढ़ जाती है। 
-इसका केन्द्रक द्विपालित होता है। 


(B) अकणिकामय-
1. लिफोसाइट- 
-ये एन्टीबाडी (प्रतिरक्षी) का निर्माण करके हानिकारक -सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने का कार्य करती है। 
-यह 20-25%  पाई जाती है। 
-इसका केन्द्रक बड़ा, गोल या दातेदार होता है। 
-सबसे छोटी श्वेत रुधिराणु है। 

a. T - लिफोसाइट- 
ये दो प्रकार की होती है-

•T - Hellper Cell:-
जब T-Hellper कोशिका नष्ट होती है तब  इन्टफेरान का स्त्राव होता है। 

•T - Killer Cell:- 
 ये सूक्ष्म जीवों को नष्ट करती है। 

b. B - लिफोसाइट- 
B - लिफोसाइट कोशिकाएं वे हैं, जो संक्रमण से लडने के लिए एन्टीबाडिज उत्पन्न करती है। 

2. मोनोसाइट-  
-रक्त में मोनोसाइटृस के स्तर में वृद्धि होती है जब किसी को संक्रमण होता है। 
-इसका केन्द्रक घोड़े के नाल के समान या सेम के बीज के समान। 
-यह कोशिकीय अपशिष्ट तथा जीवाणुओं का भक्षण करती है। 
-सबसे बड़ी श्वेत रुधिराणु है। 
-यह 2-10% पाई जाती है। 

  




                                          





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